प्रचण्ड समप (शिमला)सर्वमान्य और सुंदर सरानाहुली स्थित कमरुदेव मंदिर के कपाट खुलने से बढ़ने लगी श्रद्धालुओ की भीड़:- कमरू देव का विश्व विख्यात अत्यंत सामान्य सा दिखने वाला विश्वविख्यात मंदिर कमराह पर्वत पर स्थित है।

 9 अप्रैल 2024 को कमरुदेव जी के मंदिर के कपाट खुलने के बाद इस पावन तीर्थ मे श्रद्धा प्रकट वालो की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। ऐतिहासिक नगरी पांगणा का लगभग 35 सदस्यीय दल कमरुदेव के दर्शन,पूजन अर्चन और अपनी मन्नौतिया कमरुदेव जी और सरानाहुली झील मे अर्पित कर रात को  पांगणा लौट आया।इस दल मे शामिल सेवानिवृत्त  उप-मंडलाधिकारी (सलुणी चंबा)डाॅक्टर किशोरीलाल शर्मा,सचिन,पंडित मुनीलाल शास्त्री,संस्कृति मर्मज्ञ डाॅक्टर जगदीश शर्मा,रोशन लाल शर्मा,कृष्ण लाल शर्मा,जितेन्द्र शर्मा,ठाकुर दास शर्मा,करसोग क्षेत्र के प्रथम श्रेणी ठेकेदार सुरेश शर्मा,पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंधक अंकुश,सेवानिवृत सीनियर फार्मासिस्ट सोमकृष्ण ,ट्रांसपोर्टर पीन्टु, आदि सहित महिलाओ का कहना है कि हर वर्ष कमरुदेव का बुलावा उन्हे आता है और वे अनुकुल और विपरीत मौसम और परिस्थितियो मे भी इस पावन यात्रा को एक या अनेक बार पूर्ण कर अपनी “कुलज” कमरुदेव जी का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वंय को धन्य करते है।इस दल की महिलाओ मे हरिप्रिया शर्मा और आशा शर्मा घुटने के आप्रेशन के बावजूद भी पैदल कमरुदेव पहुंची।इन दोनो की आस्था,निष्ठा और ऊर्जा अनुकरणीय है। पांगणा के श्रद्धालुओ के अतिरिक्त इण्डिया टीवी के कामेश्वर शर्मा व साथियो,कलकत्ता के धार्मिक पर्यटको के दल ने भी कमरुदेव जी का आशीर्वाद प्राप्त किया।डॉक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि सरानाहुली कमरुनाग यात्रा क्षेत्र अनेक सांस्कृतिक आस्थाओ और धार्मिक विश्वासो से जुडा है।प्रतिवर्ष लाखों लोग कमरू देव के दर्शन करने के लिए सरानाहुली,मझोठी रोहांडा,मंडी शिवरात्रि और राज्य स्तरीय देवता मेला सुंदर नगर आते हैं।अपने मनोरथ विवाह की कामना, विवाह के पश्चात आशीर्वाद लेने,  संतान उत्पत्ति, मुंडन संस्कार करने तथा अब तो पर्यटन की दृष्टि से भी भ्रमण करने के लिए लोग कमरुनाग आते हैं।सुकेत संस्कृति साहित्य और जन कल्याण मंच के अध्यक्ष डाॅक्टर  हिमेंद्र  बाली “हिम”का कहना है कि कमरुदेव देव तीर्थ की स्थापना पांडवों द्वारा की गई थी। अतः इस तीर्थ की स्थापना लगभग 5150 वर्ष पहले हुई है।लेकिन सरानाहुली झील का इतिहास इससे भी पुराना है।इस झील के तट पर प्रतिष्ठापित कमरू देव जी के इस साधारण से देओरे के गर्भ गृह में स्थापित कमरू देव जी की प्रतिमा भी बहुत ही साधारण है। कमरू देव जी के इस देओरे के सामने बनी झील का इतिहास इस मंदिर से भी पुराना है।धार्मिक दृष्टि से कमरुदेव का वर्णन “छैओड़ी”नामक पारंपरिक मौखिक गाथा मे मिलता है।कमरूनाग झील से भी अनेक  किवंदंतियां जुड़ी है।कमरु नाग की उत्पति “कुम्बर” नामक झाडी के बीच से होने के कारण यह नाग कमरुनाग कहलाए। मनमोहक झील के भीतर पुण्य श्रद्धालुओ द्वारा अर्पित किए गए सिक्के सोने चांदी के जेवरात बडी मात्रा में भरे पड़े हैं। सदियों से आस्था का अकूत खजाना समेटे इस झील मे कमरुदेव जी अपने पूर्व जन्म मे नागरुप मे विराजमान है।यही कारण है कि कमरुदेव जी के श्रीविग्रह के समक्ष श्रद्धालुओ द्वारा अर्पित धन और सोना-चादी को “छाण्डा”(विशेष शृंगार) उत्सव के बाद कमरुदेव जी के मुख्य गूर अपने कर कमलो से झील मे अर्पित करते है। इस झील के कारण ही इस स्थान को “सरानाहुली” और “देओसर” भी कहते हैं यह झील चारों ओर से रखाल, रई,तोश,,खरसू, देवदार,बान और कायल आदि के वृक्षो,नाना प्रकार के पुष्पो,औषधीय द्र्व्यो व”गौहरो”(कुम्बर)के क्षुपो से घिरी है।इन पे पेड़ो मे से सात पेड़ो मे स्वर्गणियो की स्थापना की गई है।तोगड़ा जी और देओ खमीशरु (डुमणा-डुमणी)अंगरक्षक के रुप मे विराजमान है।ये देवगण इस पावन तीर्थ की रक्षा करते है। कमरुदेव जी के पूर्व कटवाल व वरिष्ठ समाजसेवी निर्मल सिंह ठाकुर जी का कहना है कि इनकी भी कमरुदेव जी की पूजा के साथ ही विधि-विधान से पूजा की जाती है। श्रद्धालु कमरुदेव (बड़ा देओ) और झील की पूजा-अर्चना के बाद झील की परिक्रमा करते है।हर वर्ष आषाढ़ की संक्रान्ति (15 जून) को सरानाहुली कमरूनाग मे प्रमुख वार्षिक मेले का आयोजन होता है।सभी धर्मो के लोग,विदेशो मे बसे भारतीय व विदेशी पैदल चलकर ऊंची टेकड़ी पर स्थित शान्त तीर्थ सरानाहुली पहुंच कर इसके प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद और कमरुदेव जी का आशीर्वाद लेते है।
सरानाहुली कमरुनाग रोहांडा-चौकी से पैदल चढ़ाई चढ़कर पहुंचा जा सकता है।चैलचौक के मडोगलु से जबाल ,सजीहणी,खुण्डा हैलीपैड तक छोटे वाहन से तथा आगे लगभग पौना घंटा की पैदल दूरी तय कर कमरुनाग पहुंच सकते है।इस मार्ग पर स्थित सकरैणी मे देव कमरुनाग आध्यात्मिक वाटिका,चतुर्भुजा मंदिर(सरादेवी)झौर का कलात्मक मंदिर दर्शनीय है। जहल के गोतखड्ड से बाईनाल ओडा तक,शाला से कमरुनाग तक छोटे वाहन योग्य तथा जाच्छ से घुराश- कमरुनाग तक लो.नि.विभाग द्वारा बड़े वाहन योग्य मार्ग का निर्माण हो रहा है।कमरुनाग मे लाठी खानदान,फुगाल और अवाझे पारंपरिक रुप से देव कार्य व्यवस्था का वहन कर निश्चित  ही आस्था के आयाम व प्रेरणास्रोत बने है।

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