विश्व हिंदी दिवस विशेष : प्रचण्ड समय से साक्षात्कार
हिंदी का राष्ट्रभाषा बनने का सपना अब भी अधूरा
– हितेन्द्र शर्मा, राज्यस्तरीय साहित्यकार एवं लेखक
कुमारसैन।

विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर प्रचण्ड समय से विशेष बातचीत में राज्यस्तरीय साहित्यकार एवं प्रसिद्ध लेखक हितेन्द्र शर्मा ने हिंदी भाषा की ऐतिहासिक यात्रा, वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियों पर गहन विचार रखे। उन्होंने कहा कि कोई भी देश जब स्वतंत्र होता है, तो उसकी प्राथमिकता अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति और अपने मूल्यों को पुनर्स्थापित करना होती है। भारत के संदर्भ में यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं बल्कि भाषायी और सांस्कृतिक भी रहा है।
हितेन्द्र शर्मा ने कहा कि प्राचीन काल में संस्कृत भारतवर्ष की बोलचाल और साहित्य की प्रमुख भाषा रही है। ऋग्वेद सहित वैदिक और लौकिक साहित्य देवनागरी लिपि में संस्कृत में ही रचा गया। कालांतर में संस्कृत से ही अनेक भारतीय भाषाओं का जन्म और विकास हुआ। किंतु विदेशी आक्रांताओं शक, मुगल और अंग्रेज ने भारतीय संस्कृति, भाषा और ज्ञान-परंपरा को नष्ट करने का सुनियोजित प्रयास किया। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों के पुस्तकालय जलाए गए और संस्कृत के स्थान पर उर्दू, फारसी और अंग्रेजी को राजकीय भाषा के रूप में थोप दिया गया। इसके बावजूद भारतीय जनमानस में संस्कृत और संस्कृति की धारा निरंतर प्रवाहित होती रही।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल राजनीतिक आज़ादी के लिए नहीं था बल्कि अपनी भाषा, धर्म, रीति-रिवाज और साहित्य की रक्षा के लिए भी था। आज़ादी के बाद यह आशा जगी कि देश की अपनी भाषा को उसका उचित स्थान मिलेगा, किंतु दुर्भाग्यवश अंग्रेजियत की मानसिकता स्वतंत्र भारत के शासन तंत्र पर हावी रही। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विरोध हुआ और इसे सशक्त संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने के लिए समय-सीमा तय की गई, परंतु सात दशकों बाद भी यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका। आज हिंदी दिवस मनाना अधिकतर एक औपचारिकता बनकर रह गया है।
हितेन्द्र शर्मा ने स्वीकार किया कि साहित्य, सिनेमा और संचार माध्यमों के कारण हिंदी का व्यापक प्रसार हुआ है और वह भारत ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर संपर्क भाषा के रूप में अपनी पहचान बना रही है। फिर भी राजभाषा से राष्ट्रभाषा बनने की यात्रा अभी अधूरी है। उत्तर भारत में हिंदी आंचलिक भाषाओं के साथ समृद्ध हो रही है, लेकिन दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर विरोध और आंदोलनों के कारण इसकी राह कठिन बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि संविधान में आंचलिक भाषाओं को सम्मान दिया गया है, यह स्वागतयोग्य है परंतु व्यवहारिक स्तर पर स्थिति भिन्न है। देश की कुल आबादी का केवल लगभग दो प्रतिशत ही अंग्रेजी जानता-समझता है फिर भी न्यायालयों और प्रशासन की भाषा आज भी अंग्रेजी है। तहसील से लेकर उच्च न्यायालय तक अधिकांश कार्य अंग्रेजी में होते हैं, जिससे आम नागरिक न्याय प्रक्रिया से सीधे जुड़ नहीं पाता और उसे अधिवक्ताओं पर निर्भर रहना पड़ता है। अधिसूचनाएं और सरकारी आदेश भी प्रायः अंग्रेजी में जारी होते हैं, जिन्हें समझना आम जनता के लिए कठिन होता है।
उन्होंने कहा कि पुलिस और राजस्व से जुड़ी कार्यवाहियों में भी उर्दू-फारसी का प्रभाव आज तक बना हुआ है, जिससे आम आदमी को अनुवादकों का सहारा लेना पड़ता है। यह एक बड़ी विडंबना है कि जिस देश की राजभाषा हिंदी है, वहां वाहन नंबर प्लेट से लेकर मोबाइल सेवाओं तक में हिंदी को दोयम दर्जे पर रखा जाता है।
शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए हितेन्द्र शर्मा ने कहा कि अंग्रेजों ने गुरुकुल परंपरा को नष्ट कर पब्लिक स्कूलों की नींव रखी और स्वतंत्रता के बाद भी हमने अपनी शिक्षा उसी ढांचे को सौंप दी। आज कई पब्लिक स्कूलों में हिंदी बोलने पर विद्यार्थियों को दंडित किया जाता है। दैनिक जीवन में नमस्ते और राम-राम जैसे पारंपरिक अभिवादन को पिछड़ेपन से जोड़ा जाता है, जबकि ‘गुड मॉर्निंग’ और ‘हाय-हेलो’ को आधुनिकता का प्रतीक मान लिया गया है।
उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में अटल बिहारी वाजपेई, पी.वी. नरसिम्हा राव, सुषमा स्वराज और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हिंदी में दिए गए भाषणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन वक्तव्यों ने विश्व मंच पर हिंदी को सम्मान दिलाया है। जी-20 शिखर सम्मेलन और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विदेशी अधिकारियों द्वारा हिंदी में संवाद इस बात का प्रमाण है कि विश्व हिंदी को स्वीकार कर रहा है। प्रश्न यह है कि जब विश्व हिंदी को सम्मान दे रहा है, तो अपने ही देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा क्यों नहीं मिल पा रहा?
हितेन्द्र शर्मा ने चेतावनी दी कि हिंदी के स्वरूप को बिगाड़ने के प्रयास भी चिंताजनक हैं। संस्कृतनिष्ठ शब्दों को हटाकर उर्दू-फारसी और अंग्रेजी शब्दों का अनावश्यक घालमेल किया जा रहा है। आंचलिक भाषाओं को हीन दृष्टि से देखा जाता है और साहित्यिक पत्रकारिता दम तोड़ती जा रही है। अंग्रेजी के माध्यम से नौकरी के लालच में युवा अपनी भाषा और संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह तर्क भी भ्रामक है कि विज्ञान केवल अंग्रेजी में ही संभव है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, चीन और जापान जैसे देश अपनी भाषाओं में वैज्ञानिक प्रगति कर रहे हैं। इसरो के वैज्ञानिकों द्वारा संस्कृत और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान व्यक्त करना एक सकारात्मक संदेश है।
अंत में हितेन्द्र शर्मा ने कहा कि तमाम चुनौतियों के बावजूद हिंदी निरंतर आगे बढ़ रही है। साहित्य, सोशल मीडिया और संचार माध्यमों के जरिए हिंदी नई पीढ़ी तक पहुंच रही है। आवश्यकता है कि सरकार हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में ठोस प्रोत्साहन दे और भारतीय समाज अपने दैनिक व्यवहार में हिंदी को अधिक से अधिक अपनाए, तभी हिंदी अपने वास्तविक सम्मान और स्थान को प्राप्त कर सकेगी।
रिपोर्ट: अश्वनी वर्मा, शिमला